कौशल्या ग्रेंड होटल में हुई दुर्घटना पर जवाबदेही तय नहीं हो पा रही

जबलपुर । सोमवार की शाम बरगी हिल्स के समीप निर्माणाधीन कौशल्या ग्रेंड होटल में हुई दुर्घटना पर जवाबदेही तय नहीं हो पा रही है। प्रारंभिक तौर पर तो पुलिस ने ठेकदार पर मामला दर्ज कर लिया है। लेकिन पूरी घटना के लिए जो लोग जिम्मेदार है वे लोग उससे कहीं न कहीं बचते नज़र आ रहे है।

किसने की लापरवाही!

मंगलवार को घटनास्थल पर पूरी तरह से सन्नाटा पसरा रहा एतियातन पुलिस के २ जवानों को घटनास्थल सील कर बैठाल दिया गया था। वहीं कलेक्टर छवि भारद्वाज के निर्देश के बाद एड. कलेक्टर छोटे सिंह ने मामले की न्यायिक जांच प्रांरभ कर दी है।
इसलिए हुआ हादसा
वैसे तो इस पूरे मामले की न्यायिक जांच के बाद स्थिति साफ हो पायेगी। कि घटना के लिए कौन जिम्मेदार है लेकिन यशभारत द्वारा प्रारंभिक तौर पर दुर्घटना का कारण जानने के लिए आर्किटेक्चचर, सिविल इजी. व विशेषज्ञों से बात की तो उन्होनें बताया कि इतने बड़े स्लेप और उचाई पर चल रहे काम के लिए बास बल्ली की सेंटिग पूरी तरह से अनुपयुक्त होती है। इसके लिए चैनल-सटर वाली सेंटिग का उपयोग होना चाहिए था। जो कि नहीं हुआ जो दुर्घटना का मुख्य कारण है इसके अलावा कार्यस्थल पर मजदूरों की सुरक्षा के लिए उपकरण और व्यवस्थाएं की जाती है वे भी नहीं थी जिसके चलते इतनी बड़ी संख्या में लोग घायल हुएं और २ लोगो को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
बच रहे जिम्मेदारी से
इस पूरे मामले में ठेकेदार के साथ-साथ इस पूरी दुर्घटना के लिए बिल्डर महेश केमतानी और आर्किटेक्चचर की जिम्मेदारी बनती है क्योंकि जबकि इतना बड़ा निर्माण कार्य चल रहा था तो वहां सुरक्षा की जिम्मेदारी भवन स्वामी की भी है लेकिन दोनो अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे है और पूरा मामला ठेकेदार पर छोड़ रहे है जबकि ठेके में जिस तरह की सेंटिग लगाने की बात थी और जितना भुगतान उसके हिसाब से काम किया जा रहा है। यह पूरी बात बिल्डर और आर्किटेक्चचर को पता थी कि इस तरह का स्लैब दुर्घटना का कारण बन सकता है उसके बाद भी पैसे बचाने के चक्कर में मजदूरों की जान से खिलवाड़ किया गया। अब उसके बाद ये दोनों जिम्मेदारी से भाग रहे है।
विधायक के है करीबी
बिल्डर महेश केमतानी शहर के एक विधायक के करीबी माने जाते है जिसका फायदा उन्हें जब तक उन्हें अपने विवादित प्रोजेक्टों में मिलता रहा है और अब इतनी बड़ी घटना के बाद मामले को सेट करने के लिए उपरी स्तर से लॉबिग शुरू हो गई। विधायक से नजदीकी संबंध होने के चलते मामले की जांच भी कहीं न कहीं प्रभावित हो सकती है जिसमें दूसरों को बकरा बनाकर बिल्डर को बचाने का प्रयास विधायक के माध्यम से हो सकता है।
मुआवजा नहीं सुरक्षा मिले
घटना के बाद कलेक्टर द्वारा मृतकों को ४-४ लाख रूपये राशि देने की घोषणा की गई है लेकिन सवाल यह उठता है कि मुआवजे की जगह यदि सुरक्षा की व्यवस्था पुख्ता हो तो मुआवजे की आवश्यकता ही न पड़े। कहने को तो प्रशासन द्वारा सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करने के लिए अनेक गाईडलाईन बनाई हुई है लेकिन शहर में बड़े से बड़ा निर्माण कार्य इन्हें ताक पर रखकर चल रहा है। शहर में बड़ी बड़ी हाई राइस बिल्डिंगों का निर्माण तो शुरू हो गया है लेकिन सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं रहता।
तय हो जिम्मेदारी
नगर निगम द्वारा नक्शा तो पास कर दिया जाता है। लेकिन उसकी मॉनिटरिंग के लिए कोई व्यवस्था नहीं है कॉलोनियों के निर्माण के दौरान मॉनिटरिंग की जाती है लेकिन भवन निर्माण के समय इस तरह के प्रावधान नहीं है यदि नगर निगम निर्माण कर्ता से ही कुछ शुल्क लेकर निर्माण की निगरानी करे तो गुणवत्ता के साथ-साथ सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सकेगीं। नियमानुसार जो भी १० लाख रूपये से अधिक की रजिस्ट्री होती है उसका एक प्रतिशत भाग मजदूरों की सुरक्षा के लिए जाता है लेकिन इस पैसे का इस्तमाल दुर्घटना के बाद ही होता है यदि दुर्घटना के पहले ही सुरक्षा के इंतजाम हो जाये तो दुर्घटना के हालात ही न बने।

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